KSHATRIYA GHANCHI SAMAJ
Saturday, August 8, 2026
राजा जयसिंह के दरबार से जुड़ा क्षत्रिय लाटेचा घाँची समाज का इतिहास और राव रुद्र का वो प्रसिद्ध दोहा
क्षत्रिय लाटेचा राजपूत घाँची समाज भारत आज हम क्षत्रिय लाटेचा घाँची समाज के इतिहास की बात करेंगे यह मुल 8 कुल की 13 गोत्र के अहिलनवाड व लाट प्रदेश के क्षत्रिय राजपुतो द्वारा विक्रम संवत 1191 में महाराजा सिद्धराज जयसिंह सोलंकी के दरबार मे क्षत्रिय राजपुतों से क्षत्रिय घाँची अंगीकृत हुए थे इस घटना के संदर्भ में अहिलनवाड के राज दरबार ने राव रुद्र ने दोहा कहा था
संवत इग्यारह सौ इकरानवे ज्येष्ठ तीज रविवार छत्रवट छोड़ क्षत्रि घाँची हुआ जयसिंघ रे दरबारवर्तमान में यह क्षत्रिय लाटेचा घाँची समाज मुख्यत इन क्षेत्रों में बसे हुए हैं राजस्थान के मारवाड़ में (यहाँ क्षत्रिय घाँची/ लाटेचा क्षत्रिय/ लाठिया सरदार) नाम से जाने जाते हैं , मेवाड़ में (कचेलियन क्षत्रिय घाँची कचेलियन शब्द राजपूतों से कच्चे घाँची बनने के कारण कचेलियन पहचान बन गई), मध्यप्रदेश में ( मारवाड़ा राजपुत नाम से जाने जाते है शाजापुर क्षेत्र में) गुजरात मे ( उतर गुजरात में व बनासकांठा , पाटण यहाँ क्षत्रिय घाँची नाम से ) इसतरह इस समाज के इन क्षेत्रों में निवासरत है और इन नामों से जाने जाते हैं क्षत्रिय घाँची नाम से क्षत्रिय वर्ण की जाति है जो मूल राजपुत वंशी है थे यह मूल घाँची नही रहे बस घाँची शब्द बाद में अपना लिया क्षत्रिय राजपुत पहचान के साथ, क्षत्रिय घाँची यह राजस्थान में मारवाड़ में जो लाटेचा राजपूत या लाटेचा क्षत्रिय कहलाते है और मध्यप्रदेश में मारवाड़ा राजपुत असल मे यह मूल अहिलनवाड से भी पहले लाट प्रदेश था वहाँ के राजपूत थे जो 1191 में रुद्रामहालय मंदिर प्रतिष्ठा के दौरान राजपूतों से आपसी मतभेद व अपनी क्षत्रिय अस्मिता पहचान के लिए अन्य राजपूतों से पृथक होकर अपनी अलग पहचान अंगीकार करके क्षत्रिय लाटेचा राजपुत घाँची पहचान से अलग स्वतंत्र पहचान अंगीकार करी विक्रम संवत 1191 ज्येष्ठ तीज रविवार के दिन अहिलनवाड महाराजा जयसिंह सोलंकी के दरबार में रूद्रमहालय मन्दिर महाराजा जयसिंह के पूर्वज मूलराज सोलंकी के द्वारा सहस्त्रों शिवलिंग स्थापन का मंदिर जो अधूरा रह गया था उसको जयसिंह ने पूरा करवाने का निर्णय किया तब सिलावटो को बुलाकर मंदिर निर्माण पूरा होने का समय पूछा तो सिलावट 24 वर्ष का बोले तब राजा ने ज्योतिषो को बुलाकर अपनी जीवन की पूछा तो ज्योतिष ने 12 वर्ष शेष बताई तब राजा ने सिलावटो को दिन और रात निर्माण कार्य जारी रख कर 12 वर्ष में पूर्ण करने का आदेश दिया ताकि जयसिंह अपने जीवनकाल में ही यह अपने पुर्वज मूलराज का रुद्रमाहालय मंदिर पूर्ण करवा सके, रात में निर्माण कार्य के लिए रोशनी की जरूरत पड़ती जिसके लिए तेल की आवश्यकता थी तो आस पास के तेलियो को बुलाया गया जो दिन रात घाणी चला तेल की व्यवस्था करते थे इन सिलावट व तेलियो के ऊपर निगरानी के लिए महाराजा सिद्धराज जयसिंह ने 189 राजपूतों को लगाया जिनके अग्रणी वेलसिह पुत्र बजेसिंह जी थे वेलसिंह जी लोद्रवा के रावल विजयराज लांझा के साथ पाटण गए थे और वही बस गए थे मंदिर निर्माण शुरू हुआ 8 वर्ष बीतने के बाद अचानक तेलियो के पास इकट्ठा हुए धन लूट जाने की चिंता सताने लगी उन्होंने वेलसिंह जी से छुट्टियों की माँग की कि उनके बेटिया बड़ी हो गयी इसलिए वो उनकी शादिया करवाकर लौट आएंगे उनकी इस मांग को वेलसिंह जी ने जयसिंह के पास पहुँचवाई लेकिन महाराजा जयसिंह जी ने मना कर दिया कि अब मंदिर निर्माण का कार्य 4 वर्ष ही शेष रहा है वो पूर्ण हों जाने के बाद में तुम्हारी कन्याओ का विवाह करवा दूंगा लेकिन तेलियो के मन मे अलग ही चल रहा था उन्होंने षड़यंत्र रचकर वहाँ निगरानी में लगे राजपूत सरदारो को भोज का आयोजन रखकर बुलाया और खाने में नशे का प्रदार्थ मिलाकर उन राजपूतों को खिला दिया जब राजपूत नशे में नींद में चले गए तो तेलियो ने मौका देखकर फ़रार हो गए जब दूसरी प्रहर के सरदार आये निगरानी के लिए तो देखा कि रात में जिन सरदारो की वहाँ duty थी वो सब नशे में नीद में थे उनको जगाकर पूछने पर तेलियो के षड्यंत्र से भागने का पता चला जब यह पूरा वर्णन महाराजा जयसिंह जी के पास पहुँचा तो उन्होंने निगरानी में लगे उन सरदारो को बुलवाया और कहाँ यह आपकी गलती की वजह से हुआ इसलिए अब आप व्यवस्था करो तेलियो की या आप स्वयं 8 वर्षों से तेल का निकालने का काम निगरानी करते करते देखते रहे हैं इसलिए आप तेल निकालकर मंदिर निर्माण पूर्ण करवाओ यह आज्ञा दे दी तब निगरानी में लगे सभी सरदारो ने मना कर दिया कि हम यह काम नही करेंगे वर्ना दूसरे हमे हींन भावना से देखेंगे व राजपूत नही समझेंगे तब राजा ने प्रलोभन देकर कहा तेलियो को एक मोहरा देता था आपको दो मोहर दूंगा लेकिन फिर भी उन राजपूतो ने मना कर दिया तब राजा के भतीज कुन्तपाल ने आगे बढ़कर राजपूतो को कहा चलो में आपके साथ यह काम करूंगा व राजा ने वचन दिया मेरे मन मे ऊंच नीच नही आएगी आप क्षत्रिय हो और क्षत्रिय ही रहोगे तब वेलसिंह भाटी ने अपने सरदारो को समझाया कि जब कुँवर कुन्तपाल स्वयं यह कार्य अपने साथ करेगे तो फिर ऊंच नीच की बात ही नही उठेगी तब दूसरे सरदारो ने वेलसिंह और कुन्तपाल के पीछे पीछे हामी भर दी, लेकिन उन राजपूतो ने कहा हम घाणी के पीछे पीछे धूप में घूम नही सकते तो महाराजा जयसिंह ने खातीयो को बुलाकर नवलखा बाग से लकड़िया मंगवाई ओर घाणी के साथ राजपूतो के लिए पाट बनवाकर बैठने की व्यवस्था करवाई ताकि उन सरदारो को घाणी के पीछे पीछे घूमना न पड़े और महाराजा ने कहा मेरा सिंहासन गज ऊंचा है लेकिन तुम्हारे सिंहासन सवा गज ऊँचा रहेगा इसप्रकार 4 वर्ष उन राजपूतो ने वेलसिंह और कुन्तपाल के नेतृत्व में मंदिर निर्माण पूर्ण करवाया इसमे उन सरदारो की संख्या कम थी तो इसमें कुछ वैश्य वर्ण के घी तेल का काम करने वाले लोगों ने भी मदद की थी जब मंदिर पूर्ण हुआ और समारोह का आयोजन किया रखा गया जिसमें वो राजपुत सरदार भी आये जिन्होंने घाणी चलाई थी वो आकर बैठे तब तक उनके पास धन भी अधिक इकट्ठा हो गया था राजा ने दुगनी मोहर देने की वजह से तो दूसरे राजपूत ईर्ष्या वश खड़े होकर कह दिया आप आधी मोहरे हमे दे दो या इस धन को आप धर्म पुण्य के कार्य मे खर्च कर दो तब उन राजपूतो ने अपने क्षत्रियोचित कर्म को प्रधान रखकर अपने अलग समाज की स्थापना कि जो उस समय राजपूत घाँची नाम से जाने गए उस समय उन राजपुत सरदारो की संख्या क्या थी उसका वर्णन राज दरबार के राज राव ने इसदोहे द्वारा उल्लेख किया है * [< तवां चालक गुणतीस, बीस खट् प्रमार बखाणु । राठोड़ पच्चीस, बेल बारेह बौराणा ॥ लाभ सोलेह गेहलोत, भाटी उगणीस भणिजे । सात पढिहार सुणोजे ॥ सुदेचा तीन बदव सही, कवि रुद्र कीरत करे। राजरे काज करवारी थू, साख साख जेता सरे ॥ ]]*संवत इग्यारह एकानवे जेठ तीज रविवार ! भावार्थ - गुणतिस 29 सौलंकी गोत्र के सरदार ! छब्बीस 26 परमार (पँवार) गोत्र के सरदार! पच्ची 25 राठौड़ गोत्र के, बीस 20 गहलोत गोत्र के, 20 बोराणा सरदार, 19 भाटी गोत्र के सरदार! बीस 20 चौहान गोत्र के 7 पढियार गोत्र के व तीन 3 सुंदेचा (परिहारिया) तीन भाई सरदार थे कुल 173 सरदार थे जिसकी कविताए रूद्र करता है। (रुद्र पाटण के राजदरबार के राज राव थे) विक्रम संवत 1191 में यह स्थापना करके वेलसिंह जी भाटी पद्मसिंह जी परिहार सातलसिंह चौहान अन्य सरदारो के नेतृत्व में अलग समाज की स्थापना रखी थी विक्रम संवत 1199 में गदोतर (गधे नुमा पत्थर) डालकर पाटण से आबू में आकर पाटण से राज राव रुद्र के छोटे भाई चंच को बुलाकर अपनी वंशावली लिखवाई जिस समय आठ कुल थे उस समय आबू में राजा विक्रम सिंह परमार थे फिर आबू से मारवाड़ में बस गए विक्रम संवत 1199 में जब वंशावली लिखवाई तब तक दहिया राजपूत वंश नही था राजपूत घाँचीयो में यह वंश का राव जी के पोथियों के अनुसार स्थापना के 300 वर्ष बाद जालोर के अंदर दहिया राजपूतो के बीच मे आपसी विवाद के कारणों से कुछ दहिया राजपूत सरदारो ने राजपूत घाँचीयो के अंदर आ गए थे इसके बाद इस वंश गोत्र राजपूत घाँची मे हुई Note - हमारी क्षत्रिय घाँची समाज किसी का इतिहास चुराना स्वीकार नहीं किया बस जो जानकारी है वो हमारे पूर्वजो के बारे में जो था वो ही बताया गया है इसमें न कोई कपोल कल्पना है या मनगढ़ंत कुछ नही है जो तत्कालीन इतिहास रावो की पोथियों में वर्णित है केवल वही है इसके अलावा आप रासमाला पुस्तक, मृदुशुमारी रिपोर्ट मारवाड़ ,बड़ौदा स्टेट गजेटियर, चालुक्य वंश रत्नमाला पुस्तक ,कुमारपाल चरितार्थ, क्षत्रिय घाँची समाज का इतिहास पुस्तक, चालुक्य वंश रत्नमाला प्रथम संस्करण भाग चतुर्थ से भी देख सकते हो
बोराणा ( तंवर वंश) शाखा का इतिहास
बोराणा/बोड़ाना ( तंवर वंश) शाखा का इतिहास क्षत्रिय लाटेचा घाँची समाज मूल अहिलनवाड व लाट प्रदेश के राजपूत सरदारो द्वारा अंगीकृत समाज है इस समाज मे बोराणा राजपूत सरदार मूल तंवर वंश के थे यह बोराणा तंवर वंश की शाखा है #बोराणा - तंवर वंश की एक शाखा है यह मूल रूप से चन्द्रवंशी क्षत्रिय है यह पांडु पुत्र अर्जुन के पुत्र परीक्षित के वंशज है तंवर बोराणा वंश की वंशावली - चंद्र - ययाति - पुरु - हस्ति - अजमीध - कुरु - शांतनु - विचित्रवीर्य - पांडु - अर्जुन - अभिमन्यु - - परीक्षित - जन्मेजय - अश्वमेघ - धर्मदेव - मनजीत – चित्ररथ - दीपपाल - उग्रसेन - सुरसेन - भूवनपति - रणजीत – रक्षकदेव - भीमसेन - नरहरिदेव – सुचरित्र - सुरसेन – पर्वतसेन – मधुक – सोनचीर - भीष्मदेव - नृहरदेव - पूर्णसेल - सारंगदेव – रुपदेव - उदयपाल - अभिमन्यु - धनपाल – भीमपाल - लक्ष्मीदेव – विश्रवा मुरसेन – वीरसेन – आनगशायी – हरजीतदेव -सुलोचन देव –कृप - सज्ज -अमर –अभिपाल – दशरथ – वीरसाल - केशोराव – विरमाहा – अजित – सर्वदत्त – भुवनपति – वीरसेन – महिपाल - शत्रुपाल – सेंधराज --जीतपाल --रणपाल - कामसेन – शत्रुमर्दन -जीवन – हरी – वीरसेन – आदित्यकेतु – थिमोधर – महर्षि –समरच्ची - महायुद्ध – वीरनाथ – जीवनराज - रुद्रसेन - अरिलक वसु - राजपाल - समुन्द्रपाल - गोमिल - महेश्वर - देवपाल (स्कन्ददेव) - नरसिंहदेव - अच्युत - हरदत्त - किरण पाल अजदेव - सुमित्र - कुलज - नरदेव - सामपाल(मतिल ) – रघुपाल -गोविन्दपाल - अमृतपाल - महित(महिपाल) - कर्मपाल - विक्रम पाल - जीतराम - चंद्रपाल - ब्रह्देश्वर (खंदक ) - हरिपाल (वक्तपाल) - सुखपाल (सुनपाल) - कीरतपाल (तिहुनपाल) - अनंगपाल प्रथम (विल्हण देव ) - बोड़ाना /बोराणा महाराज अनंगपाल प्रथम के पुत्र बोराणा के वंशज बोराणा कहलाये यही बोराणा राजपूत कहलाये तंवर वंशी बोराणा के मूल पुरुष पांडु पुत्र अर्जुन इनका पुत्र परीक्षित व महाराजा अगनपाल प्रथम थे तंवर वंशी बोराणा समाज की कुलदेवी तँवर वँश की कुलदेवी चिलाय माताजी तु संगती तंवरा तणी चावी मात चिलाय! म्हैर करी अत मातथूं दिल्ली राज दिलाय!! तँवर बोराणा वँश की कुलदेवी चिलाय माता है। इतिहास में तँवरो की कुलदेवी के अनेक नाम मिलते हैं जैसे चिलाय माता, जोग माया (योग माया), योगेश्वरी (जोगेश्वरी), सरूण्ड माता, मन्सादेवी आदि। दिल्ली के इतिहास में तँवरो की कुलदेवी का नाम योग माया मिलता है, तंवरो के पुर्वज पांडवो ने भगवान कृष्ण की बहन को कुलदेवी मानकर इन्द्रप्रस्थ में कुलदेवी का मंदिर बनवाया और उसी स्थान पर दिल्ली के संस्थापक राजा अनंगपाल प्रथम ने पुनः योगमाया के मंदिर का निर्माण करवाया। तंवर वंश कुलदेवी जय माँ चिल्लाय माता जय पाण्डुपुत्र अर्जुन जय बोराणा तंवर समाज
Thursday, July 2, 2026
Saturday, May 10, 2025
891 वाँ अंगीकरण दिवस क्षत्रिय लाटेचा राजपूत घाँची ( मारवाड़ा राजपूत mp) समाज की ऐतिहासिक व राजनीतिक उपलब्धियाँ
891 वाँ स्थापना अंगीकरण दिवस
29 मई 2025 को क्षत्रिय लाटेचा राजपुत घाँची समाज का सबसे बड़ा त्यौहार अंगीकरण/स्थापना दिवस अपने क्षत्रियवंशी पूर्वजों के स्वाभिमान दिवस के रूप में
समाज के महापुरुषों को अवश्य याद करे जिन्होंने समाज के अंगीकरण में भूमिका निभाई थी जिसमे वेलसिंह पुत्र बजेसिंह भाटी , वीरधवल सिंह राठौड़, सातलसिंह चौहान, पदमसिंह प्रतिहार आदि क्षत्रिय सरदारो ने समाज के अंगीकरण में अग्रणी भूमिका निभाई थी महाराजा जयसिंह सोलंकी के दरबार पाटण मे
हमारा समाज हर वर्ष जेयष्ट शुक्ल तृतिया तिथि को मनाया जाता है इस दिन समाज के अंगीकरण का नेतृत्व करने वाले विश्वेश्वर राजा कुमारपाल सिंह सौलंकी, ठाकुर वेलसिंह भाटी व 13 गोत्रो के 189 लाटेचा राजपूत सरदारो को याद किया जाता है
इसी दिन 8 कुल 13 गोत्र के 189 राजपूत सरदारो के परिवारो ने अपने क्षत्रिय स्वाभिमान के साथ राजपुताना में आकर बस गए
890 वर्षो मे समाज की इतिहासिक , ऐतिहासिक व राजनीतिक उपलब्धियां
# सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण अपने समाज के राजा ने 11 वी शताब्दी में करवाया था
# मोहमद गौरी को धूल चटा कर अरब तक खदेड़ने वाला राजा भीमदेव अपने समाज का था
# 8 वी से 12 वी शताब्दी तक अहिलनवाड़ा मे ऐतिहासिक धरोहरो का निर्माण अपने समाज के राजाओ ने करवाया था जिसमे से कई निर्माण अपनी समाज की रानियों ने भी करवाये थे
#अपने समाज के क्षत्रिय राजपूत से अंगीकृत क्षत्रिय घाँची बनने के समय से वर्तमान से 891 वर्ष पहले अपने समाज मे दहेज़ प्रथा बंद हैं जो आज भी कायम है
# समाज के सभी राजपूत सरदारो ने अंगीकृत क्षत्रिय घाँची होने के बाद अहिंलवाड़ा से राजपुताना मे प्रस्थान से पूर्व आबू पर्वत पर ब्राह्मणों से शुद्धि यज्ञ करवाकर समाज में माँस भक्षण व मदिरा सेवन पूर्ण वर्जित माना
#1191 से वर्तमान तक यानि राजपूत से क्षत्रिय घाँची अंगीकृत होने के 890 वर्षो मे समाज में आज भी दहेज़ प्रथा पर पूर्ण रूप से प्रतिबंद है
# वर्तमान में भी समाज अपनी क्षत्रिय पहचान को बनाये रखने के लिए कुछ क्षेत्रों में अपने नाम के साथ" सिंह" लिखते थे और अभी भी कुछ लिखते हैं
क्षत्रिय राजपुत घाँची 8 कुल 13 गोत्रो के 189 क्षत्रिय राजपूत परिवारों से 891 वर्षो मे समाज की जनसंख्या वर्तमान मे 7 लाख से अधिक है राजस्थान में मारवाड़ में क्षत्रिय घाँची ओर लाटेचा सरदार व मध्यप्रदेश में शाजापुर क्षेत्र में मारवाड़ा राजपुत नाम से पहचाने जाते हैं
# क्षत्रिय घाँची समाज के लोग राजस्थान के जोधपुर,जालौर, आहोर ,पाली ,बाड़मेर ,बालोतरा
सिरोही,भीनमाल व सांचौर के अलावा राजस्थान के किसी भी जिलो मे निवासित नही है
#क्षत्रिय घाँची समाज को 1991 में बने ओबीसी आरक्षण आयोग के बाद आर्थिक स्थिति के अनुसार ओबीसी कोटे में रखा गया है
क्षत्रिय घाँची समाज को ओबीसी की सबसे अपडेटेड लिस्ट मे क्षत्रिय घाँची समाज का जाति क्रमांक 22 नंबर है
विक्रम संवत 1191 से 2082 विक्रम संवत यानी 891 वर्षो में समाज की उपलब्धि
समाज की लोकतंत्र के 71 वर्षों में राजनैतिक उपलब्धियां
(1 )मदन जी राठौड़ राज्यसभा सांसद राजस्थान भाजपा प्रदेश अध्यक्ष भी है
(2 )समाज के विधायक भीमराज भाटी पाली विधानसभा
(3 )मदन राठौड़ विधायक सुमेरपुर विधानसभा
(4) महाराष्ट्र में क्षत्रिय घाँची
समाज की एक महिला विधायक जो समाज की प्रथम विधायक बनी थी आजाद भारत में
(5)अन्नाराम बोराणा जिला प्रमुख सिरोही
(6 )राकेश भाटी सांसद प्रतिनिधि पाली संसद क्षेत्र
(7) रेखा राकेश भाटी पाली सभापति
सोजत नगरपालिका सभापति जुगल किशोर निकुंभ
(8 )वजिंगराम जी बोराणा शिवगंज सभापति
9 इसके अतिरिक्त समाज के कई लोग राजनीतिक पद जैसे सरपंच ,पार्षद आदि रहे है समाज का कोई भी व्यक्ति 71 वर्षो मे केवल एक सांसद चुना गया इसके अतिरिक्त न ही कोई केंद्र सरकार में मंत्री या राज्य सरकार मंत्री बनाया किसी पार्टी ने जबकि समाज की कुल जनसंख्या 6 लाख से अधिक है
समाज की इतिहास से जुडी जानकारी को समाज के प्रत्यके व्यक्ति तक पहुँचाये व समाज के प्रत्यके ग्रुप में शेयर जरूर करे
Thursday, September 12, 2024
क्षत्रिय लाटेचा सरदारो ( क्षत्रिय घाँची समाज ) का इतिहास
क्षत्रिय लाटेचा राजपूत सरदारो का ( क्षत्रिय घाँची ) समाज का इतिहास
क्षत्रिय वर्ण की घाँची जाति है जो मूल राजपुत वंशी है थे यह मूल घाँची नही रहे बस घाँची शब्द बाद में अपना लिया क्षत्रिय राजपुत पहचान के साथ , क्षत्रिय घाँची यह राजस्थान में मारवाड़ में जो लाटेचा राजपूत या लाटेचा क्षत्रिय कहलाते थे ये पाटण के ओर लाट प्रदेश के राजपूत थे जो 1191 में रूद्रमन्दिर बनने के दौरान राजपूतों ने राजा के दौरान राजपूतों से राजपुत घाँची बने थे
रूद्रमन्दिर महाराजा जयसिंह के पूर्वज मूलराज के द्वारा शिव मंदिर जो अधूरा रह गया था उसको जयसिंह ने पूरा करवाने का निर्णय किया तब सिलावटो को बुलाकर मंदिर निर्माण पूरा होने का समय पूछा तो सिलावट 24 वर्ष का बोले तब राजा ने ज्योतिषो को बुलाकर अपनी जीवन की पूछा तो ज्योतिष ने 12 वर्ष शेष बताई तब राजा ने सिलावटो को दिन और रात निर्माण कार्य जारी रख कर 12 वर्ष में पूर्ण करने का आदेश दिया ताकि जयसिंह अपने जीवनकाल में ही यह अपने पुर्वज मूलराज का रुद्रमाहालय मंदिर पूर्ण करवा सके , रात में निर्माण कार्य के लिए रोशनी की जरूरत पड़ती जिसके लिए तेल की आवश्यकता थी तो आस पास के तेलियो को बुलाया गया जो दिन रात घाणी चला तेल की व्यवस्था करते थे इन सिलावट व तेलियो के ऊपर निगरानी के लिए महाराजा सिद्धराज जयसिंह ने 189 राजपूतों को लगाया जिनके अग्रणी वेलसिह पुत्र बजेसिंह जी थे वेलसिंह जी लोद्रवा के रावल विजयराज लांझा के साथ पाटण गए थे और वही रह गए थे मंदिर निर्माण शुरू हुआ 8 वर्ष बीतने के बाद अचानक तेलियो के पास इकट्ठा हुए धन लूट जाने की चिंता सताने लगी उन्होंने वेलसिंह जी से छुट्टियों की माँग की कि उनके बेटिया बड़ी हो गयी इसलिए वो उनकी शादिया करवाकर लौट आएंगे उनकी इस मांग को वेलसिंह जी ने जयसिंह के पास पहुँचवाई लेकिन महाराजा जयसिंह जी ने मना कर दिया कि अब मंदिर निर्माण का कार्य 4 वर्ष ही शेष रहा है वो पूर्ण हों जाने के बाद में तुम्हारी कन्याओ का विवाह करवा दूंगा लेकिन तेलियो के मन मे अलग ही चल रहा था उन्होंने षड़यंत्र रचकर वहाँ निगरानी में लगे राजपूत सरदारो को भोज का आयोजन रखकर बुलाया और खाने में नशे का मिलाकर उन राजपूतों को खिला दिया जब राजपूत नशे में नींद में चले गए तो तेलियो ने मौका देखकर फ़रार हो गए
जब दूसरी प्रहर के सरदार आये निगरानी के लिए तो देखा कि रात में जिन सरदारो की वहाँ duty थी वो सब नशे में नीद में थे उनको जगाकर पूछने पर तेलियो के षड्यंत्र से भागने का पता चला जब यह पूरा वर्णन महाराजा जयसिंह जी के पास पहुँचा
तो उन्होंने निगरानी में लगे उन सरदारो को बुलवाया और कहाँ यह आपकी गलती की वजह से हुआ इसलिए अब आप व्यवस्था करो तेलियो की या आप स्वयं 8 वर्षो से तेल का निकालने का काम निगरानी करते करते देखते रहे हैं इसलिए आप तेल निकालकर मंदिर निर्माण पूर्ण करवाओ यह आज्ञा दे दी
तब निगरानी में लगे सभी सरदारो ने मना कर दिया कि हम यह काम नही करेंगे वर्ना दूसरे हमे हींन भावना से देखेंगे व राजपूत नही समझेंगे तब राजा ने प्रलोभन देकर कहा तेलियो को एक मोहरा देता था आपको दो मोहर दूंगा लेकिन फिर भी उन राजपूतो ने मना कर दिया तब राजा के भतीज कुन्तपाल ने आगे बढ़कर राजपूतो को कहा चलो में आपके साथ यह काम करूंगा व राजा ने वचन दिया मेरे मन मे ऊंच नीच नही आएगी आप क्षत्रिय हो और क्षत्रिय ही रहोगे तब वेलसिंह भाटी ने अपने सरदारो को समझाया कि जब कुँवर कुन्तपाल स्वयं यह कार्य अपने साथ करेगे तो फिर ऊंच नीच की बात ही नही उठेगी तब दूसरे सरदारो ने वेलसिंह और कुन्तपाल के पीछे पीछे हामी भर दी,
लेकिन उन राजपूतो ने कहा हम घाणी के पीछे पीछे घूम नही सकते तो महाराजा जयसिंह ने सुथारों को बुलाकर घाणी के साथ राजपूतो के लिए पाठ बनवाकर बैठने की व्यवस्था करवाई ताकि उन सरदारो को घाणी के पीछे पीछे घूमना न पड़े और महाराजा ने कहा मेरा सिंहासन गज ऊंचा है लेकिन तुम्हारे सिंहासन सवा गज ऊँचा रहेगा इसप्रकार 4 वर्ष उन राजपूतो ने वेलसिंह और कुन्तपाल के नेतृत्व में मंदिर निर्माण पूर्ण करवाया इसमे उन सरदारो की संख्या कम थी तो इसमें कुछ वैश्य वर्ण के घी तेल का काम करने वाले लोगों ने भी मदद की थी
जब मंदिर पूर्ण हुआ और समारोह का आयोजन किया रखा गया जिसमें वो राजपुत सरदार भी आये जिन्होंने घाणी चलाई थी वो आकर बैठे तब तक उनके पास धन भी अधिक इकट्ठा हो गया था राजा ने दुगनी मोहर देने की वजह से तो दूसरे राजपूत ईर्ष्या वश खड़े होकर कह दिया आप आधी मोहरे हमे दे दो या इस धन को आप धर्म पूण्य के कार्य मे खर्च कर दो तब उन राजपूत सरदारो ने मना कर दिया तब दूसरे राजपूतो ने कहा अब आप राजपूत नही रहे घाँची हो गए हो और हम अब आपके साथ बेटी व्यवहार नही करेगे
जब दूसरे राजपूतो द्वारा इस प्रकार के व्यवहार के कारण वो सरदार महाराजा के पास उनको वचन का याद दिलवाने गए कि आपने वचन दिया था लेकिन उस समय की परिस्थिति ओर दूसरे सरदारो का संख्या प्रभाव अधिक होने के कारण महाराजा ने चुप रहना ही ज्यादा उचित समझा
तब उन सरदारो ने कहा कि क्षत्रिय के लिए वचन के संदर्भ में रघुकुल रीति सदा चली आयी प्राण जाए पर वचन न जाए लेकिन आप वचन देने के बाद भी मौन हो गए तब उन राजपूतो ने अपने क्षत्रियोचित कर्म को प्रधान रखकर अपने अलग समाज की स्थापना कि जो उस समय राजपूत घाँची नाम से जाने गए उस समय उन राजपुत सरदारो की संख्या क्या थी उसका वर्णन राज दरबार के राज राव ने इसदोहे द्वारा उल्लेख किया है
【< तवां चालक गुणतीस, बीस खट् प्रमार बखाणु । राठोड़ पच्चीस , बेल बारेह बौराणा ॥ लाभ सोलेह गेहलोत, भाटी उगणीस भणिजे । सात पढिहार सुणोजे ॥ सुदेचा तीन बदव सही , कवि रुद्र कीरत करे । राजरे काज करवारी थू , साख साख जेता सरे ॥ ]]
संवत इग्यारह एकानवे जेठ तीज रविवार !
भावार्थ - गुणतिस 29 सौलंकी गोत्र के सरदार ! छब्बीस 26 परमार(पँवार) गोत्र के सरदार ! पच्ची 25 राठौड़ गोत्र के , बीस 20 गहलोत गोत्र के ,20 बोराणा सरदार , 19 भाटी गोत्र के सरदार ! बीस 20 चौहान गोत्र के 7 पढियार गोत्र के व तीन 3 सुंदेचा (परिहारिया ) तीन भाई सरदार थे कुल 173 सरदार थे जिसकी कविताए रूद्र करता है । ( रुद्र पाटण के राजदरबार के राज राव थे )
विक्रम संवत 1191 में यह स्थापना करके वेलसिंह जी भाटी पद्मसिंह जी परिहार सातलसिंह चौहान अन्य सरदारो के नेतृत्व में अलग समाज की स्थापना रखी थी
विक्रम संवत 1199 में गदोतर ( गधे नुमा पत्थर ) डालकर पाटण से आबू में आकर पाटण से राज राव रुद्र के छोटे भाई चंच को बुलाकर अपनी वंशावली लिखवाई जिस समय आठ कुल थे
उस समय आबू में राजा विक्रम सिंह परमार थे फिर आबू से मारवाड़ में बस गए
विक्रम संवत 1199 में जब वंशावली लिखवाई तब तक दहिया राजपूत वंश नही था राजपूत घाँचीयो में यह वंश का राव जी के पोथियों के अनुसार स्थापना के 300 वर्ष बाद जालोर के अंदर दहिया राजपूतो के बीच मे आपसी विवाद के कारणों से कुछ दहिया राजपूत सरदारो ने राजपूत घाँचीयो के अंदर आ गए थे इसके बाद इस वंश गोत्र राजपूत घाँची मे हुई
Note - हमारी क्षत्रिय घाँची समाज किसी का इतिहास चुराना स्वीकार नहीं किया बस जो जानकारी है वो हमारे पूर्वजो के बारे में जो था वो ही बताया गया है इसमें न कोई कपोल कल्पना है या मनगढ़ंत कुछ नही है जो तत्कालीन इतिहास रावो की पोथियों में वर्णित है केवल वही है इसके अलावा आप रासमाला पुस्तक , चालुक्य वंश रत्नमाला प्रथम संस्करण भाग चतुर्थ से भी देख सकते हो
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