Saturday, August 8, 2026

उत्तर गुजरात , बनासकांठा व पाटण के 28 गाँव मे क्षत्रिय लाटेचा घाँची समाज





 

“क्षत्रिय घाँची समाज: मारवाड़, मेवाड़, मध्यप्रदेश और गुजरात में समाज की पहचान”

 


राजा जयसिंह के दरबार से जुड़ा क्षत्रिय लाटेचा घाँची समाज का इतिहास और राव रुद्र का वो प्रसिद्ध दोहा

क्षत्रिय लाटेचा राजपूत घाँची समाज भारत आज हम क्षत्रिय लाटेचा घाँची समाज के इतिहास की बात करेंगे यह मुल 8 कुल की 13 गोत्र के अहिलनवाड व लाट प्रदेश के क्षत्रिय राजपुतो द्वारा विक्रम संवत 1191 में महाराजा सिद्धराज जयसिंह सोलंकी के दरबार मे क्षत्रिय राजपुतों से क्षत्रिय घाँची अंगीकृत हुए थे इस घटना के संदर्भ में अहिलनवाड के राज दरबार ने राव रुद्र ने दोहा कहा था
संवत इग्यारह सौ इकरानवे ज्येष्ठ तीज रविवार छत्रवट छोड़ क्षत्रि घाँची हुआ जयसिंघ रे दरबार
वर्तमान में यह क्षत्रिय लाटेचा घाँची समाज मुख्यत इन क्षेत्रों में बसे हुए हैं राजस्थान के मारवाड़ में (यहाँ क्षत्रिय घाँची/ लाटेचा क्षत्रिय/ लाठिया सरदार) नाम से जाने जाते हैं , मेवाड़ में (कचेलियन क्षत्रिय घाँची कचेलियन शब्द राजपूतों से कच्चे घाँची बनने के कारण कचेलियन पहचान बन गई), मध्यप्रदेश में ( मारवाड़ा राजपुत नाम से जाने जाते है शाजापुर क्षेत्र में) गुजरात मे ( उतर गुजरात में व बनासकांठा , पाटण यहाँ क्षत्रिय घाँची नाम से ) इसतरह इस समाज के इन क्षेत्रों में निवासरत है और इन नामों से जाने जाते हैं क्षत्रिय घाँची नाम से क्षत्रिय वर्ण की जाति है जो मूल राजपुत वंशी है थे यह मूल घाँची नही रहे बस घाँची शब्द बाद में अपना लिया क्षत्रिय राजपुत पहचान के साथ, क्षत्रिय घाँची यह राजस्थान में मारवाड़ में जो लाटेचा राजपूत या लाटेचा क्षत्रिय कहलाते है और मध्यप्रदेश में मारवाड़ा राजपुत असल मे यह मूल अहिलनवाड से भी पहले लाट प्रदेश था वहाँ के राजपूत थे जो 1191 में रुद्रामहालय मंदिर प्रतिष्ठा के दौरान राजपूतों से आपसी मतभेद व अपनी क्षत्रिय अस्मिता पहचान के लिए अन्य राजपूतों से पृथक होकर अपनी अलग पहचान अंगीकार करके क्षत्रिय लाटेचा राजपुत घाँची पहचान से अलग स्वतंत्र पहचान अंगीकार करी विक्रम संवत 1191 ज्येष्ठ तीज रविवार के दिन अहिलनवाड महाराजा जयसिंह सोलंकी के दरबार में रूद्रमहालय मन्दिर महाराजा जयसिंह के पूर्वज मूलराज सोलंकी के द्वारा सहस्त्रों शिवलिंग स्थापन का मंदिर जो अधूरा रह गया था उसको जयसिंह ने पूरा करवाने का निर्णय किया तब सिलावटो को बुलाकर मंदिर निर्माण पूरा होने का समय पूछा तो सिलावट 24 वर्ष का बोले तब राजा ने ज्योतिषो को बुलाकर अपनी जीवन की पूछा तो ज्योतिष ने 12 वर्ष शेष बताई तब राजा ने सिलावटो को दिन और रात निर्माण कार्य जारी रख कर 12 वर्ष में पूर्ण करने का आदेश दिया ताकि जयसिंह अपने जीवनकाल में ही यह अपने पुर्वज मूलराज का रुद्रमाहालय मंदिर पूर्ण करवा सके, रात में निर्माण कार्य के लिए रोशनी की जरूरत पड़ती जिसके लिए तेल की आवश्यकता थी तो आस पास के तेलियो को बुलाया गया जो दिन रात घाणी चला तेल की व्यवस्था करते थे इन सिलावट व तेलियो के ऊपर निगरानी के लिए महाराजा सिद्धराज जयसिंह ने 189 राजपूतों को लगाया जिनके अग्रणी वेलसिह पुत्र बजेसिंह जी थे वेलसिंह जी लोद्रवा के रावल विजयराज लांझा के साथ पाटण गए थे और वही बस गए थे मंदिर निर्माण शुरू हुआ 8 वर्ष बीतने के बाद अचानक तेलियो के पास इकट्ठा हुए धन लूट जाने की चिंता सताने लगी उन्होंने वेलसिंह जी से छुट्टियों की माँग की कि उनके बेटिया बड़ी हो गयी इसलिए वो उनकी शादिया करवाकर लौट आएंगे उनकी इस मांग को वेलसिंह जी ने जयसिंह के पास पहुँचवाई लेकिन महाराजा जयसिंह जी ने मना कर दिया कि अब मंदिर निर्माण का कार्य 4 वर्ष ही शेष रहा है वो पूर्ण हों जाने के बाद में तुम्हारी कन्याओ का विवाह करवा दूंगा लेकिन तेलियो के मन मे अलग ही चल रहा था उन्होंने षड़यंत्र रचकर वहाँ निगरानी में लगे राजपूत सरदारो को भोज का आयोजन रखकर बुलाया और खाने में नशे का प्रदार्थ मिलाकर उन राजपूतों को खिला दिया जब राजपूत नशे में नींद में चले गए तो तेलियो ने मौका देखकर फ़रार हो गए जब दूसरी प्रहर के सरदार आये निगरानी के लिए तो देखा कि रात में जिन सरदारो की वहाँ duty थी वो सब नशे में नीद में थे उनको जगाकर पूछने पर तेलियो के षड्यंत्र से भागने का पता चला जब यह पूरा वर्णन महाराजा जयसिंह जी के पास पहुँचा तो उन्होंने निगरानी में लगे उन सरदारो को बुलवाया और कहाँ यह आपकी गलती की वजह से हुआ इसलिए अब आप व्यवस्था करो तेलियो की या आप स्वयं 8 वर्षों से तेल का निकालने का काम निगरानी करते करते देखते रहे हैं इसलिए आप तेल निकालकर मंदिर निर्माण पूर्ण करवाओ यह आज्ञा दे दी तब निगरानी में लगे सभी सरदारो ने मना कर दिया कि हम यह काम नही करेंगे वर्ना दूसरे हमे हींन भावना से देखेंगे व राजपूत नही समझेंगे तब राजा ने प्रलोभन देकर कहा तेलियो को एक मोहरा देता था आपको दो मोहर दूंगा लेकिन फिर भी उन राजपूतो ने मना कर दिया तब राजा के भतीज कुन्तपाल ने आगे बढ़कर राजपूतो को कहा चलो में आपके साथ यह काम करूंगा व राजा ने वचन दिया मेरे मन मे ऊंच नीच नही आएगी आप क्षत्रिय हो और क्षत्रिय ही रहोगे तब वेलसिंह भाटी ने अपने सरदारो को समझाया कि जब कुँवर कुन्तपाल स्वयं यह कार्य अपने साथ करेगे तो फिर ऊंच नीच की बात ही नही उठेगी तब दूसरे सरदारो ने वेलसिंह और कुन्तपाल के पीछे पीछे हामी भर दी, लेकिन उन राजपूतो ने कहा हम घाणी के पीछे पीछे धूप में घूम नही सकते तो महाराजा जयसिंह ने खातीयो को बुलाकर नवलखा बाग से लकड़िया मंगवाई ओर घाणी के साथ राजपूतो के लिए पाट बनवाकर बैठने की व्यवस्था करवाई ताकि उन सरदारो को घाणी के पीछे पीछे घूमना न पड़े और महाराजा ने कहा मेरा सिंहासन गज ऊंचा है लेकिन तुम्हारे सिंहासन सवा गज ऊँचा रहेगा इसप्रकार 4 वर्ष उन राजपूतो ने वेलसिंह और कुन्तपाल के नेतृत्व में मंदिर निर्माण पूर्ण करवाया इसमे उन सरदारो की संख्या कम थी तो इसमें कुछ वैश्य वर्ण के घी तेल का काम करने वाले लोगों ने भी मदद की थी जब मंदिर पूर्ण हुआ और समारोह का आयोजन किया रखा गया जिसमें वो राजपुत सरदार भी आये जिन्होंने घाणी चलाई थी वो आकर बैठे तब तक उनके पास धन भी अधिक इकट्ठा हो गया था राजा ने दुगनी मोहर देने की वजह से तो दूसरे राजपूत ईर्ष्या वश खड़े होकर कह दिया आप आधी मोहरे हमे दे दो या इस धन को आप धर्म पुण्य के कार्य मे खर्च कर दो तब उन राजपूतो ने अपने क्षत्रियोचित कर्म को प्रधान रखकर अपने अलग समाज की स्थापना कि जो उस समय राजपूत घाँची नाम से जाने गए उस समय उन राजपुत सरदारो की संख्या क्या थी उसका वर्णन राज दरबार के राज राव ने इसदोहे द्वारा उल्लेख किया है * [< तवां चालक गुणतीस, बीस खट् प्रमार बखाणु । राठोड़ पच्चीस, बेल बारेह बौराणा ॥ लाभ सोलेह गेहलोत, भाटी उगणीस भणिजे । सात पढिहार सुणोजे ॥ सुदेचा तीन बदव सही, कवि रुद्र कीरत करे। राजरे काज करवारी थू, साख साख जेता सरे ॥ ]]*संवत इग्यारह एकानवे जेठ तीज रविवार ! भावार्थ - गुणतिस 29 सौलंकी गोत्र के सरदार ! छब्बीस 26 परमार (पँवार) गोत्र के सरदार! पच्ची 25 राठौड़ गोत्र के, बीस 20 गहलोत गोत्र के, 20 बोराणा सरदार, 19 भाटी गोत्र के सरदार! बीस 20 चौहान गोत्र के 7 पढियार गोत्र के व तीन 3 सुंदेचा (परिहारिया) तीन भाई सरदार थे कुल 173 सरदार थे जिसकी कविताए रूद्र करता है। (रुद्र पाटण के राजदरबार के राज राव थे) विक्रम संवत 1191 में यह स्थापना करके वेलसिंह जी भाटी पद्मसिंह जी परिहार सातलसिंह चौहान अन्य सरदारो के नेतृत्व में अलग समाज की स्थापना रखी थी विक्रम संवत 1199 में गदोतर (गधे नुमा पत्थर) डालकर पाटण से आबू में आकर पाटण से राज राव रुद्र के छोटे भाई चंच को बुलाकर अपनी वंशावली लिखवाई जिस समय आठ कुल थे उस समय आबू में राजा विक्रम सिंह परमार थे फिर आबू से मारवाड़ में बस गए विक्रम संवत 1199 में जब वंशावली लिखवाई तब तक दहिया राजपूत वंश नही था राजपूत घाँचीयो में यह वंश का राव जी के पोथियों के अनुसार स्थापना के 300 वर्ष बाद जालोर के अंदर दहिया राजपूतो के बीच मे आपसी विवाद के कारणों से कुछ दहिया राजपूत सरदारो ने राजपूत घाँचीयो के अंदर आ गए थे इसके बाद इस वंश गोत्र राजपूत घाँची मे हुई Note - हमारी क्षत्रिय घाँची समाज किसी का इतिहास चुराना स्वीकार नहीं किया बस जो जानकारी है वो हमारे पूर्वजो के बारे में जो था वो ही बताया गया है इसमें न कोई कपोल कल्पना है या मनगढ़ंत कुछ नही है जो तत्कालीन इतिहास रावो की पोथियों में वर्णित है केवल वही है इसके अलावा आप रासमाला पुस्तक, मृदुशुमारी रिपोर्ट मारवाड़ ,बड़ौदा स्टेट गजेटियर, चालुक्य वंश रत्नमाला पुस्तक ,कुमारपाल चरितार्थ, क्षत्रिय घाँची समाज का इतिहास पुस्तक, चालुक्य वंश रत्नमाला प्रथम संस्करण भाग चतुर्थ से भी देख सकते हो

बोराणा ( तंवर वंश) शाखा का इतिहास

बोराणा/बोड़ाना ( तंवर वंश) शाखा का इतिहास क्षत्रिय लाटेचा घाँची समाज मूल अहिलनवाड व लाट प्रदेश के राजपूत सरदारो द्वारा अंगीकृत समाज है इस समाज मे बोराणा राजपूत सरदार मूल तंवर वंश के थे यह बोराणा तंवर वंश की शाखा है #बोराणा - तंवर वंश की एक शाखा है यह मूल रूप से चन्द्रवंशी क्षत्रिय है यह पांडु पुत्र अर्जुन के पुत्र परीक्षित के वंशज है तंवर बोराणा वंश की वंशावली - चंद्र - ययाति - पुरु - हस्ति - अजमीध - कुरु - शांतनु - विचित्रवीर्य - पांडु - अर्जुन - अभिमन्यु - - परीक्षित - जन्मेजय - अश्वमेघ - धर्मदेव - मनजीत – चित्ररथ - दीपपाल - उग्रसेन - सुरसेन - भूवनपति - रणजीत – रक्षकदेव - भीमसेन - नरहरिदेव – सुचरित्र - सुरसेन – पर्वतसेन – मधुक – सोनचीर - भीष्मदेव - नृहरदेव - पूर्णसेल - सारंगदेव – रुपदेव - उदयपाल - अभिमन्यु - धनपाल – भीमपाल - लक्ष्मीदेव – विश्रवा मुरसेन – वीरसेन – आनगशायी – हरजीतदेव -सुलोचन देव –कृप - सज्ज -अमर –अभिपाल – दशरथ – वीरसाल - केशोराव – विरमाहा – अजित – सर्वदत्त – भुवनपति – वीरसेन – महिपाल - शत्रुपाल – सेंधराज --जीतपाल --रणपाल - कामसेन – शत्रुमर्दन -जीवन – हरी – वीरसेन – आदित्यकेतु – थिमोधर – महर्षि –समरच्ची - महायुद्ध – वीरनाथ – जीवनराज - रुद्रसेन - अरिलक वसु - राजपाल - समुन्द्रपाल - गोमिल - महेश्वर - देवपाल (स्कन्ददेव) - नरसिंहदेव - अच्युत - हरदत्त - किरण पाल अजदेव - सुमित्र - कुलज - नरदेव - सामपाल(मतिल ) – रघुपाल -गोविन्दपाल - अमृतपाल - महित(महिपाल) - कर्मपाल - विक्रम पाल - जीतराम - चंद्रपाल - ब्रह्देश्वर (खंदक ) - हरिपाल (वक्तपाल) - सुखपाल (सुनपाल) - कीरतपाल (तिहुनपाल) - अनंगपाल प्रथम (विल्हण देव ) - बोड़ाना /बोराणा महाराज अनंगपाल प्रथम के पुत्र बोराणा के वंशज बोराणा कहलाये यही बोराणा राजपूत कहलाये तंवर वंशी बोराणा के मूल पुरुष पांडु पुत्र अर्जुन इनका पुत्र परीक्षित व महाराजा अगनपाल प्रथम थे तंवर वंशी बोराणा समाज की कुलदेवी तँवर वँश की कुलदेवी चिलाय माताजी तु संगती तंवरा तणी चावी मात चिलाय! म्हैर करी अत मातथूं दिल्ली राज दिलाय!! तँवर बोराणा वँश की कुलदेवी चिलाय माता है। इतिहास में तँवरो की कुलदेवी के अनेक नाम मिलते हैं जैसे चिलाय माता, जोग माया (योग माया), योगेश्वरी (जोगेश्वरी), सरूण्ड माता, मन्सादेवी आदि। दिल्ली के इतिहास में तँवरो की कुलदेवी का नाम योग माया मिलता है, तंवरो के पुर्वज पांडवो ने भगवान कृष्ण की बहन को कुलदेवी मानकर इन्द्रप्रस्थ में कुलदेवी का मंदिर बनवाया और उसी स्थान पर दिल्ली के संस्थापक राजा अनंगपाल प्रथम ने पुनः योगमाया के मंदिर का निर्माण करवाया। तंवर वंश कुलदेवी जय माँ चिल्लाय माता जय पाण्डुपुत्र अर्जुन जय बोराणा तंवर समाज